इक रात तेरी चादर तले?
क्या दोगे जगह मुझे अपनी आँखों तले?
क्यों याद नहीं मैं तुझे अब इस कदर?
क्यों नहीं करता तू मेरा ज़िक्र दर-बदर?
मुस्कान में अपनी पहले तू देता था मुझे जगह,
अब क्यों नहीं महसूस होती मुझे तेरी वह रज़ा?
हर रोज़ क्यों तू मुझे देता था एक नई वजह जीने की?
हर रोज़ क्यों मैं जीने लग जाती थी सोच के तेरी याद की?
आ जाती थी क्यों मैं दौड़ते हुए, पहने तेरी दी हुई पायल?
क्या आज भी मेरी यादें, मेरी बातें तुझको करती हैं कायल?
बहुत सवाल पूछ लिए ना मैंने?
एक आख़िरी पूछूँ?
सच-सच जवाब दोगे?
क्या…
इक रात चादर तले?
क्या दोगे जगह मुझे अपनी आँखों तले?
एक आख़िरी बार?
एक आख़िरी बार?
-सवाल जवाब की सिलसिलो में उलझा हुआ दिल!


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