ये सुबह आज कुछ अलग थी…
हाँ, आज आँख खुलते ही तेरी याद साथ नहीं थी।
हाँ, आज सबसे पहली ख़्याल तेरी नहीं थी।
शायद दिमाग़ को समझ आ चुका था कि तू मेरा नहीं।

पर उस दिल का क्या? जो तेरा नाम सुनते ही धड़कने लगता है?
उस दिल का क्या? जो आज भी तेरी मुस्कान देखकर मुस्कुराने लगता है?
उस दिल का क्या? जो हर शाम सिर्फ़ तेरे आने की राह देखता है?
उस दिल का क्या? जो शायद पहला ख़्याल तेरा न हो, मगर पूरा दिन बस तेरा ही सोचता है?

हम्म… समझाना पड़ेगा उस दिल को…
उसे समझाना होगा कि तुझे भूलना पड़ेगा।
भूलना पड़ेगा उसे जो तेरा नहीं है…
जैसे आज, वैसे ही हर रोज़ भूलना होगा उसे।
और समझना होगा इसे।

कि…
हाँ, ये सुबह आज कुछ अलग थी…
आज सुबह कुछ अलग थी।

~ सुबह से शाम में जलता दिल

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