सजा है आज ये सहर दिवाली मनाने को!

तुझे पता है? कई अरसों से मैंने दिवाली नहीं मनाई!

मन दौड़ता है काटने को, तुझे पता है? कई सालों से मैंने इसकी रिहाई नहीं कराई!

आशिक़ बना फिरता हूँ मिटाने वजूद को, तुझे पता है? लम्हों ने इस मन की सुनवाई नहीं कराई!

इश्क़ ने ऐसा रुलाया इन आँखों को, तुझे पता है? वक्त के साथ इन आँखों ने ख़ूबसूरती है गवाई!

चल मर मिट मैं भी जाता तेरा होने को, तुझे तो पता ही होगा! तूने इस नाचीज़ की क्या खूब कदर है दिखाई!

बस बस ज़्यादा नहीं लिखूँगा, मनाई थी तेरे साथ एक रोज़ दिवाली,

सजा है आज ये सहर दिवाली मनाने को! वो आख़िरी थी, कई बरसों से मैंने दिवाली नहीं मनाई! कई बरसों से मैंने दिवाली नहीं मनाई!

– दिल (जो आज भी निकम्मा सा है, मायूस सा है)

2 responses to “यह शहर और दिवाली!”

  1. Barso se maine diwali nahi manae- can relate a lot with this line❤️

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